ग्रहों का असर - ज्योतिष चक्र द्वारा मानव शरीर की रचना। Featured

Written by  Jun 23, 2019

ज्योतिष वेद का एक महत्वपूर्ण अंग है। जिस प्रकार हमारे शरीर के प्रमुख छह अंग हैं, वेदों के भी शिक्षा, कल्प, व्याकरण, छन्द, ज्योतिष आदि के यह अंग माने गए हैं।

छह वेदांगों में ज्योतिष को नेत्र की तरह उपयोगी अंग माना गया है। प्राचीन मनीषियाें ने अपने संदेशों में स्पष्ट कहा है कि प्रत्येक व्यक्ति को ज्योतिष का ज्ञान होना चाहिए। क्योंकि यह विद्या ही एक ऐसी विद्या है जो व्यक्ति को भूत−भविष्य व वर्तमान के बारे में पूरी जानकारी देती है। मनुष्यों को आने वाले सभी अच्छे−बुरे फलों के बारे में पहले से ही सभी जानकारी हमें नवग्रहों की स्थिति से मिल जाती है। इसलिए इस विद्या को ज्योतिरूपी चक्षु भी कहा जाता है।

ग्रहों का असर मानव शरीर की उत्पत्ति पर भी पड़ता है। प्रकृति की उत्पत्ति नवग्रहों से होती है और जब मनुष्य उत्पन्न हो जाता है तो ग्रहों के अंश प्रत्येक मानव शरीर के अंदर रहते हैं।  

यह चराचर जगत् ग्रहों से ही व्याप्त है। ग्रहों का असर मानव शरीर की उत्पत्ति में किस प्रकार कार्य करता है आईये इसी विषय पर जानने का प्रयत्न करें। जैसा कि हम जानतें है कि मानव की उत्पत्ति माँ के गर्भ में करीब नौ महीनों व कुछ दिनों की यात्रा के उपरान्त होती है और इस जीव उत्पत्ति की यात्रा में सातों ग्रहों की भूमिका पूर्ण रूप से होती है। राहू-केतु छाया ग्रहों को छोड़कर।

मनुष्य शरीर की उत्पत्ति :  शुक्र ग्रह

गर्भधारण के प्रथम महीने पर आधिपत्य शुक्र ग्रह का होता है। उस महीने गर्भ में वीर्य में स्थित शुक्राणु, स्त्री के डिंबाण में अवस्थित रज से मिलकर अण्डे का रूप लेता है। ज्योतिष में वीर्य का नैसर्गिक कारक शुक्र ग्रह होता है।

द्वितीय महीना : मंगल ग्रह

इसी प्रकार द्वितीय महीने पर मंगल ग्रह का आधिपत्य होता है। मंगल एक अग्नि तत्व ग्रह है जिसका कार्य अण्डे को माँस के पिण्ड में परिवर्तित करना होता है। अग्नि तत्व के कारण माता के शरीर में पित्त प्रकृत्ति स्वभाविक रूप से बढती है और गर्भस्थ महिलाओं को उल्टी, चक्कर व बेचैनी के लक्षण परिलक्षित होने लगते है।

तृतीय महीना : बृहस्पति ग्रह

इसी क्रम में बृहस्पति ग्रह तृतीय महीने पर अपना आधिपत्य ग्रहण करता है जिसके फलस्वरूप वह मांस का लोथडा पुरुष और स्त्री लिंग के जीव के रूप में परिवर्तित होता है। चूंकी बृहस्पति ग्रह जल तत्व ग्रह है इसके परिणाम स्वरूप पित्त में कमी आती है और द्वितिय माह के लक्षण समाप्त हो एक अन्दरूनी खुशी का एहसास होता है और गर्भस्थ महिला गर्भ को पूर्ण रूप से अनुभव करने लगती है।

चौथा  महीना : सूर्य ग्रह

माँस के पिण्ड को आकार और आधार प्रदान करने के लिए हड्डियों का नैसर्गिक कारक सूर्य का आधिपत्य चतुर्थ मास में लक्षित होता है। उस माँस रूपी पिण्ड (जीव) के अन्दर हड्डियाँ बन जाती है और शरीर लगभग पूर्णता की ओर अग्रसर होने लगता है।

पंचम महीना : चन्द्रमा ग्रह

पंचम माह पर चन्द्रमा का आधिपत्य होता है और जैसा कि ज्योतिष में चन्द्रमा तरल पदार्थ, जल, रक्त प्रवाह इत्यादि का नैसर्गिक कारक होता है। इस माह में शरीर नसों, नाडियों व माँसपेशियों से परिपूर्ण हो जाता है।

छठा महीना : शनि ग्रह

ग्रहों की इस व्यवस्था के क्रम में छठे महीनें शनि का पूर्ण आधिपत्य गर्भस्थ शिशु पर होता है। शनि अपने नैसर्गिक कार्यकत्व के अनुरूप शिशु के शरीर में बाल उत्पन्न करता है साथ ही शिशु के शरीर का रंग गोरे, काले व साँवले का निर्धारण इसी माह शनि के द्वारा होता है।

सप्तम महीना : बुध ग्रह

सातवें महीनें गर्भस्थ शिशु पर बुध ग्रह का पूर्ण प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। बुध बुद्धि का सामान्य कारक है और गर्भ में पल रहे शिशु को बुद्धि उपलब्ध करवाता है और गर्भस्थ शिशु पर माता के आचार विचार का प्रभाव पडना शुरू हो जाता है। अतः इन दिनों के बाद से माता की सोच, चिन्ता व आचरण आने वाले शिशु की बुद्धि का निर्माण करतें है। जैसा कि हम जानते है महाभारत काल में अभिमन्यु ने गर्भ में ही चक्रव्यूह तोडना सीख लिया था।

अष्टम महीना : लग्नेश

आंठवें महीने का आधिपत्य गर्भस्थ की माँ का लग्नेश होता है इस वजह से माँ का स्वास्थ्य का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पूर्ण रूप से पडता है। आठवें महीने में बहुत सावधानी बरतने की जरूरत होती है। यदि आठवें महीनें में माँ का लग्नेश पीडित हो जाये तो गर्भपात की संभावना बढ जाती है और शिशु की मृत्यु तक हो सकती है। इसी वजह से सांतवें महीने का शिशु जन्म लेने पर बच सकता है परन्तु आठवें महीनें का शिशु यदि जन्म ले तो बचने की संभावना कम होती है।

नवम महीना : चन्द्रमा

नौवें महीनें का अधिपती होने का भार फिर से चन्द्रमा उठाता है और अपनी प्रकृत्ति के अनुसार गर्भ के अन्दर पेट में इतना पानी उत्पन्न करता है कि शिशु जिसमें तैर सके और आराम से जन्म ले सकने मे समर्थ हो जाए।

नौ महीने के बाद गर्भ पर सूर्य का आधिपत्य होता है तथा सूर्य अपनें स्वाभाविक अग्नि तत्व प्रभाव से पेट में गर्मी पैदा कर शिशु को माता के शरीर से अलग कर देता है। वह जिन माँसपेशियों से जकडा होता है, उनसे छूट जाता है

इस प्रकार मानव नौ महीनें में ग्रहों के असर को लेकर देह धारण करता है। जन्म के वक्त आसमान के ग्रहों की स्थिति अर्थात अपनी जन्मकुण्डली के अनुसार इन ग्रहों के द्वारा बनाये जीवन पथ पर अपने विवेक व कर्म द्वारा सुख व तकलीफ हासिल करता हुआ अग्रसर होता है।

ज्योतिषाचार्य सुनील वशिष्ठ, जयपुर

Last modified on Wednesday, 17 July 2019 19:20

 

 

  1. Popular
  2. Trending
  3. Comments

Calender

« November 2019 »
Mon Tue Wed Thu Fri Sat Sun
        1 2 3
4 5 6 7 8 9 10
11 12 13 14 15 16 17
18 19 20 21 22 23 24
25 26 27 28 29 30  

Twitter Feed

Desh Videsh
https://t.co/CIMQ0gpojD - Official Trailer: Sonu Ke Titu Ki Sweety | Luv Ranjan | Kartik Aaryan, Nushrat Bharucha,… https://t.co/yG6zGQNqle
Desh Videsh
Guardians of the Galaxy director James Gunn defends Chris Pratt after controversial tweet https://t.co/SiFIvSHKFy
Desh Videsh
The Steps to Spiritual Growth: Mind, Body, Soul https://t.co/zdiQTpRvt8
Desh Videsh
How to Create and Maintain a Balcony Garden in your Apartment https://t.co/kgauRgJgVP
Desh Videsh
Why we should get early in the morning... https://t.co/TpjwUMoTPy
Desh Videsh
5 Things That Happen to Your Body When You Quit Exercising for a Month https://t.co/rKAFrjAkEB
Desh Videsh
Power Yoga And its Benefits for a better physical and mental health https://t.co/Puydr8LT6L
Desh Videsh
Vinod Pandita PMC Guru Master Class https://t.co/YIxPjgwWy5
Desh Videsh
Takeaways from Business Leadership Master Class by Vinod K Pandita https://t.co/XgrHVDn9D4
Follow Desh Videsh on Twitter