आज के परिवेश में प्रेम शब्द कितना मिसअन्डरस्टुड ?????? Featured

Written by  Aug 23, 2019

आज सभी सोशल मीडिया, टीवी चैनेलो पर प्रेम को ले कर बहस छिड़ी हुई है सारे प्रेमी एक-दूसरे के ऊपर क्रोध से भरे हुए हैं।

और बड़े मजे की बात है की जो लोग प्रेम को लेकर बहस कर रहे है लेकिन ये लोग भी नहीं जानते की, यह प्रेम है क्या? यह प्रेम की अभीप्सा क्या है? यह प्रेम की पागल प्यास क्या है? कौन-सी बात है, जो प्रेम के नाम से हम चाहते हैं और नहीं उपलब्ध कर पाते हैं?

इनके घर भी प्रेम से उतने ही खाली जितने अन्य लोगो के।

इस दुनिया में प्रेम शब्द जितना मिसअंडरस्टुड है, जितना गलत समझा जाता है, उतना शायद मनुष्य की भाषा में कोई दूसरा शब्द नहीं! प्रेम पर भजन है प्रेम पर गाने हैं प्रेम पर फिल्में बनी किंतु प्रेम कहीं नहीं दिखाई देता|

प्रेम के संबंध में जो गलत-समझी है, उसका ही विराट रूप इस जगत के सारे उपद्रव, हिंसा, कलह, द्वंद्व और संघर्ष हैं। प्रेम की बात इसलिए थोड़ी ठीक से समझ लेनी जरूरी है।

भगवान श्री कृष्ण,  गुरु नानक, कबीर, मीरा इत्यादि जिस प्रेम की बात करते है वह यह प्रेम नहीं है आज आए दिन आप जैसी लड़कियां माता पिता का दिल तोड़कर शादियां करती है और कोई भी शादी सफल नहीं हो पाती क्योंकि प्रेम को सही अर्थों में समझा ही नहीं गया।

इस संदर्भ में एक बात विशेष रूप से कहना चाहता हूँ कि प्रेम की प्रकार नहीं होती love is not of different kind.

कहने का मतलब कि भाई का प्रेम अलग, माता पिता का प्रेम अलग, और पति का प्रेम अलग | और जो व्यक्ति ये कहे की में इसको प्रेम करूँगा उसको नहीं करूंगा |

ये व्यक्तव्य किसी व्यापारी हो सकता है, किसी राजनैतिकज्ञ का हो सकता है, किसी स्वार्थी या मतलबी का हो सकता है या फिर किसी चालबाज़ का हो सकता है , प्रेमी व्यक्तित्व का नहीं |

प्रेम की एक ही प्रकार होती है और प्रेम प्रेम ही होता है प्रेमी सभी को प्रेम करेगा चाहे वो पति हो, माता पिता हो , भाई बहिन हो वह चाहे दोस्त हो चाहे दुश्मन और जब तक प्रेम आपका व्यक्तित्व ना बन जाए समझना आप प्रेम में नहीं है प्रेम के नाम पर कुछ और चल रहा है।

लोग अपनी कामवासना को प्रेम कहते हैं लोग अपने आकर्षण को प्रेम कहते हैं लोग अपने अहंकार को प्रेम कहते हैं लोग अपने मोह को प्रेम कहते हैं और लोग अपने बहुत गहन में छुपे हुए स्वार्थ को प्रेम कहते हैं।

प्रेम कभी एकांत नहीं ढूंढ़ता, प्रेम कभी बंद कमरा नहीं ढूंढ़ता और ना ही निर्वस्त्र होना चाहता | और जिसे आप प्रेम कहते हो यह सेक्स और ओरल सेक्स है और आकर्षण है और प्रेम का आवरण ओढ़ कर लम्बी लम्बी उड़ान भर रहा है।

प्रेम का अर्थ होता है दूसरे का ध्यान और तथाकथित प्रेम जो बहुत सूक्ष्म में कामवासना का ही अंग है विद्रोह और आक्रोश जिसका दूसरा रूप है।

इसलिए योगीराज भगवान श्री कृष्ण कहते है कि कामवासना परिपक्व होकर क्रोध और विद्रोह का रूप धारण कर लेती है और अपने आप को प्रेमी के रूप में प्रायोजित तो करती है किन्तु बहुत सूक्ष्म में कामवासना  ही होती है और हमारा अचेतन मन उसे पकड़ नहीं सकता।

जहा प्रेम में विद्रोह दिखाई दे, समझाना यह कामवासना ही यात्रा कर रहा है  जिसका की प्रेम से कोई संबंध नहीं है इसलिए शरीर के तल पर किये गये सारे प्रेम असफल हो जाते हों, तो आश्चर्य नहीं।

प्रेम लाता है शालीनता, प्रेम लाता है  सभी के प्रति इज्जत, प्रेम लाता है समर्पण, प्रेम किसी को दुख नहीं पहुंचाना चाहता, प्रेम कभी मालिक नहीं होता।

प्रेमी खुद दुखी हो सकता है किंतु दूसरों को दुख नहीं दे सकता, जहां ईर्ष्या  है, वहां प्रेम संभव नहीं है। जहां प्रेम है, वहां ईर्ष्या  संभव नहीं है।

हमारे वेदों उपनिषदों में इस प्रेम का जिक्र किया गया है और इस प्रकार का प्रेम आपको परमात्मा तक पहुंचा देता है।

फिर दोबारा से कहूंगा कि प्रेम की प्रकार नहीं होती love is not of different kinds…

कहने का मतलब मां-बाप का प्रेम अलग प्रकार का भाई का प्रेम अलग प्रकार का , बहन का प्रेम अलग प्रकार का, और पति का प्रेम अलग प्रकार का।

किंतु मनुष्य का मन इतना चालबाज होता है कि वह अपनी कामवासना को प्रेम कहता है वह अपने अहंकार को प्रेम कहता है वह अपने मोह को प्रेम कहता है।

प्रेम खुद दुखी हो सकता है किंतु दूसरे को दुख नहीं पहुंचा सकता , प्रेम विद्रोही नहीं होता | इसलिए प्रेम में खुद रमो, प्रेम को अपना व्यक्तित्व ( personality) बनाओ भगवान श्री कृष्ण,  गुरु नानक, कबीर , मीरा इत्यादि इस प्रेम की बात करते है जो की परमात्मा तक की यात्रा करा  सकता है और तथकथित प्रेम नर्क तक ले जाता है।

तो फिर प्रेम क्या है ??????????????????

प्रेम शरीर के तल पर नहीं खोजा जा सकता था, इसका स्मरण आना जरूरी है और जब तक प्रेम को सही सही नहीं समझा जाएगा भजन कीर्तन, गाने, फिल्मे ,कोई कानून, कोई व्यवस्था, कोई बहस, कोई अनुशासन इत्यादि काम नहीं आएगा।

आज तक मनुष्य-जाति शरीर के तल प्रेम को खोजती रही है, इसलिए जगत में प्रेम जैसी घटना घटित नहीं हो पायी। प्रेम शरीर के तल पर नहीं, चेतना के तल पर घटने वाली घटना है। रिलेशनशिप नहीं, स्टेट आफ माइंड--जब किसी से प्रेम एक संबंध नहीं है, बल्कि मेरा प्रेम स्वभाव बनता है, तब, तब जीवन में प्रेम की घटना घटती है। तब प्रेम का असली सिक्का हाथ में आता है। तब यह सवाल नहीं है कि किससे प्रेम, तब यह सवाल नहीं है कि किस कारण प्रेम। तब प्रेम अकारण है, तब प्रेम इससे-उससे नहीं है, तब प्रेम है।

कोई भी हो तो प्रेम के दीये का प्रकाश उस पर पड़ेगा। आदमी हो तो आदमी, वृक्ष हो तो वृक्ष, सागर हो तो सागर, चांद हो तो चांद, कोई हो तो फिर एकांत में प्रेम का दीया जलता रहेगा। प्रेम परमात्मा तक ले जाने का द्वार है।

लेकिन जिस प्रेम को हम जानते हैं, वह सिर्फ नर्क तक ले जाने का द्वार बनता है। जिस प्रेम को हम जानते हैं, वह पागलखानों तक ले जाने का द्वार बनता है। जिस प्रेम को हम जानते हैं, वह कलह, द्वंद्व, संघर्ष, हिंसा, क्रोध, घृणा, इन सबका द्वार बनता है। वह प्रेम झूठा है।

जिस प्रेम की मैं बात कर रहा हूं, वह प्रभु तक ले जाने का मार्ग बनता है, लेकिन वह प्रेम संबंध नहीं है। वह प्रेम स्वयं के चित्त की दशा है, उसका किसी से कोई नाता नहीं, आपसे नाता है।

जब तक मां सोचती है कि बेटे से प्रेम, मित्र सोचता है मित्र से प्रेम, पत्नी सोचती है पति से प्रेम, भाई सोचता है बहन से प्रेम, जब तक संबंध की भाषा में कोई प्रेम को सोचता है, तब तक उसके जीवन में प्रेम का जन्म नहीं हो सकता है।

प्रेम संबंध की भाषा में नहीं, किससे प्रेम नहीं; मेरा प्रेमपूर्ण होना है। मेरा प्रेमपूर्ण होना अकारण, असंबंधित, चौबीस घंटे मेरा प्रेमपूर्ण होना है। किसी से बंधकर नहीं, किसी से जुड़कर नहीं, मेरा अपने आपमें प्रेमपूर्ण होना हैं। यह प्रेम मेरा स्वभाव, मेरी श्वास बने।

श्वास आये, जाये, ऐसा मेरा प्रेम--चौबीस घंटे सोते, जागते, उठते हर हालत में। मेरा जीवन प्रेम की भाव-दशा, एक लविंग एटिटयूड, एक सुगंध, जैसे फूल से सुगंध गिरती है।

किसके लिए गिरती है? राह से जो निकलते हैं, उनके लिए? फूल को शायद पता भी न हो कि कोई राह से निकलेगा। किसके लिए, जो फूल को तोड़कर माला बना लेंगे और भगवान के चरणों में चढ़ा देंगे, उनके लिए?

किसके लिए--फूल की सुगंध किसके लिए गिरती है? किसी के लिए नहीं। फूल के अपने आनंद से गिरती है। फूल के अपने खिलने से गिरती है। फूल खिलता है, यह उसका आनंद है। सुगंध बिखर जाती है।

प्रेम आपका स्वभाव बने--उठते, बैठते, सोते, जागते; अकेले में, भीड़ में, वह बरसता रहे फूल की सुगंध की तरह, दीये की रोशनी की तरह, तो प्रेम प्रार्थना बन जाता है, तो प्रेम प्रभु तक ले जाने का मार्ग बन जाता है, तो प्रेम जोड़ देता है समस्त से, सबसे, अनंत से।

इसलिए बच्चों को प्रेम सिखाएं:

प्रेम शारीरिक, मानसिक विकार की भांति नहीं  ----- चेतना की सुवाश  की भांति, आदमी हो तो आदमी, वृक्ष हो तो वृक्ष, सागर हो तो सागर, चांद हो तो चांद, कोई न हो तो फिर एकांत में प्रेम का दीया जलता रहे।

 

प्रेम संस्कार के भांति नहीं                      -  प्रेम स्वभाव की भांति

प्रेम सम्बन्ध (रिलेशनशिप) की भांति नहीं     -  मन: स्थिति (स्टेट आफ माइंड) की भांति

किसी के  कारण प्रेम नहीं                     -  अकारण   प्रेम

प्रेम पर्सनालिटी की भांति नहीं                 -  प्रेम इंडिवीडुअलिटी की भांति

सामाजिक व्यवस्था की भांति नहीं             -  प्रेम  भाव-दशा, एक लविंग एटिटयूड की  भांति

प्रेम किसी कृत्य  की भांति नहीं               -  प्रेम में स्वयं  प्रेमपूर्ण होना है। अकारण, प्रेम प्रार्थना की भांति

 

इस प्रकार का प्रेम बच्चो को बुद्ध, महावीर, कृष्ण, कबीर, गुरुनानक, मीरा, क्राइस्ट, मुस्लिम साध्वी राबिया इत्यादि की श्रेणी में खड़ा कर देगा, और जो फिर एक स्वस्थ समाज के निर्माण में सहयोगी होगा।

 

 

दिनेश यादव

MHRM, LLB, DIPM, PGDCA

 

एक स्वस्थ समाज के निर्माण में सहयोगी

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Last modified on Friday, 23 August 2019 20:55

 

 

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